दरभंगा के इस 'व्यापारी' ने बैंक में जमा करवाए थे 77 अरब के हीरे,जो आजतक ...



The diamond trader Nirav Modi is accused of killing Indian banks but the story of the deceased jeweler Muhammad Mohsin of Darbhanga is just fine. Mohsin's successor has alleged that a foreign bank killed her 77 billion rupees diamond gems which she deposited in 1923.

Senior journalist Surendra Kishore wrote in an article, "When a foreign bank was drowned in Darbhanga's jeweler Mohanin billion rupees," the cost of 77 billion rupees was as per 1985. Mohsen, who was a jeweler of Hyderabad Nizam, deposited 77 billion rupees of diamond jewelery on August 21, 1923 in the Kolkata branch of the LGM Bank. His receipt is also with his successor. However, later the bank wrote that the amount of 21 million Rishmark (German currency) deposited by Mohsin has no exchange value.





The Government of India had not helped Mohsin, whereas this matter was also raised in the Indian Parliament in the eighties. Mohsin, a native of Darbhanga in Bihar, has been fighting for a bank for many years. Vaidyanath Mishra, who fought the case from Mohsin, had told this writer in the eighties that the bank never gave the original issue to the court. Vaidyanath Mishra is no longer in this world. Now there is no information about whether there is anybody going ahead with this case or not. But this is a wonderful matter in itself.

What is the story: According to Vaidyanath Mishra, this is the story of the trillions of Indian Rupee drowning in a foreign bank. Prior to his death, Mohsen had made Vaidyanath Mishra the successor of the money deposited in this foreign bank through donation letter. Mohsin was a debtor to the Mishra family.





Mohsin used to work as a jeweler in the Nizam of Hyderabad. It is said that from there they brought a lot of diamonds and jewels in some way. Mohsin deposited those diamond jewels in the Kolkata branch of the Netherlands Trading Agency. Later, the trading society turned into a bank, which was named Aljiman Bank Netherlands NV.

Determining the value of those diamonds and jewels, the trading society gave Mohsen a receipt of 21 million Rishmark on August 21, 1923. But when Mishra started writing correspondence with the bank to bring this money back from abroad, then Eligin Bank has ever written that it is ready to return, and never said that the amount of the mark is no longer any exchange value And neither is there any price.

Mishra made an in-depth plea with then Prime Minister Indira Gandhi, Finance Minister Pranab Mukherjee and other later ruling authority. Keep on revolving across the country. Did not get success

हीरा व्यापारी नीरव मोदी पर तो भारतीय बैंकों के पैसे मार लेने का आरोप है लेकिन, दरभंगा के दिवंगत जौहरी मुहम्मद मोहसिन की कहानी ठीक उल्टी है. मोहसिन के उत्तराधिकारी का आरोप है कि एक विदेशी बैंक ने उसके 77 अरब रुपए के वो हीरे जवाहरात मार लिए जो उसने 1923 में जमा किए थे.

वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर अपने एक आलेख 'जब एक विदेशी बैंक में डूब गए थे दरभंगा के जौहरी मोहसिन के अरबों रुपए' में लिखते हैं कि 77 अरब रुपए की कीमत 1985 के अनुसार है. हैदराबाद निजाम के जौहरी रहे मोहसिन ने 77 अरब रुपए की कीमत के हीरे जवाहरात एलजीमिन बैंक की कोलकाता शाखा में 21 अगस्त 1923 को जमा कराए थे. उसकी रसीद भी उसके उत्तराधिकारी के पास है. हालांकि बाद में बैंक ने लिख दिया कि ‘मोहसिन ने जो 21 करोड़ रीशमार्क (जर्मन मुद्रा) जमा किया था, उसका अब कोई विनिमय मूल्य नहीं है

भारत सरकार ने मोहसिन की कोई मदद नहीं की थी जबकि अस्सी के दशक में भारतीय संसद में भी यह मामला उठा था. बिहार के दरभंगा के मूल निवासी मोहसिन कई साल तक बैंक से मुकदमा लड़ते रहे. मोहसिन की तरफ से केस लड़ने वाले वैद्यनाथ मिश्र ने अस्सी के दशक में इस लेखक को बताया था कि बैंक ने मूल मुद्दे को कभी अदालत के सामने आने ही नहीं दिया. वैद्यनाथ मिश्र अब इस दुनिया में नहीं हैं. अब इस बात की भी कोई जानकारी नहीं है कि इस केस को आगे बढ़ाने वाला कोई है या नहीं. लेकिन यह अपने आप में अद्भुत मामला है.

क्या है कहानी : वैद्यनाथ मिश्र के अनुसार एक विदेशी बैंक में किसी भारतीय के खरबों रुपए डूबने की यह कहानी है. मोहसिन ने मरने से पहले शिक्षक वैद्यनाथ मिश्र को दान पत्र के जरिए इस विदेशी बैंक में जमा धन का उत्तराधिकारी बना दिया था. मोहसिन, मिश्र परिवार के कर्जदार थे

मोहसिन हैदराबाद निजाम के यहां जौहरी का काम करते थे. कहते हैं कि वहां से उन्होंने किसी-न-किसी तरीके से काफी हीरे-जवाहरात लाए थे. मोहसिन ने उन हीरे-जवाहरात को नीदरलैंड ट्रेडिंग एजेंसी की कोलकाता ब्रांच में जमा किया था. बाद में ट्रेडिंग सोसायटी एक बैंक में बदल गई, जिसका नाम पड़ा एल्जीमीन बैंक नीदरलैंड एन.वी.

उन हीरे-जवाहरात की कीमत आंक कर ट्रेडिंग सोसायटी ने मोहसिन को 21 अगस्त, 1923 को 21 करोड़ रीशमार्क की रसीद दे दी थी. पर जब मिश्र ने इस धन को विदेश से वापस लाने के लिए उस बैंक से पत्र-व्यवहार शुरू किया, तो एल्जीमीन बैंक ने कभी तो लिखा कि वह लौटाने को तैयार है, तो कभी कहा कि उस राशि मार्क का अब न तो कोई विनिमय मूल्य है और न ही कोई कीमत.

मिश्र ने इस संबंध में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी और बाद के अन्य सत्ताधिकारी नेताओं से बारी-बारी से गुहार लगाई. देश भर में चक्कर काटते रहे. पर सफलता नहीं मिली.

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